विनोद प्रिय प्रभु

Availability: In stock
₹79.00
-
+

Quick Overview

जब हमारी सुबह हंसी और प्रेम की ताल से हो तो परमात्‍मा स्‍वयं हमारे जीवन में नृत्‍य करने लगेगा। सुबह हंसते हुए (प्रसन्‍नचित) उठना ही सच्‍ची प्रार्थना है। समग्र प्रकृति आपकी हंसी की प्रतीक्षा में है। आप हंसते हैं तो सारी प्रकृति आपके साथ हंसती है। चारों ओर इसकी प्रति ध्‍वनि गूंज उठती है। सारा वातावरण आनंदमय हो उठता है। श्री श्री रविंशकरजी के इस प्रवचन संग्रह के अध्‍ययन से लाखों लोगों की शंकाओं के बादल छट गए और उनके चेहरों पर मुस्‍कान खिल गई। नाचो, गाओ, उत्‍सव मनाओं क्‍योंकि कि परमात्‍मा नटखट है, विनोद प्रिय है।
More Information
Name विनोद प्रिय प्रभु
ISBN 9790000000000
Pages 88
Author Shri Shri Ravishankar Ji
Format Paperback
विनोद प्रिय प्रभु
  • Free Shipping on orders Above INR 600 Valid In India Only
  • Self Publishing Get Your Self Published
  • Online support 24/7 10am to 7pm+91-9716244500