अष्‍टवक्र महागीता भाग 1 मुक्ति की आकांक्षा

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मनुष्‍य जाति के पास बहुत शास्‍त्र हैं, पर अष्‍टावक्र-गीता जैसा शास्‍त्र नहीं। वेद फीके हैं उपनिषद बहुत धीमी आवाज में बोलते हैं। गीता में भी ऐसा गौरव नहीं, जैसा अष्‍टावक्र की संहिता में है।
ओशो द्वारा अष्‍टावक्र-संहिता के 298 सूत्रों में से 1से 34 सूत्रों पर प्रश्‍नोत्‍तर सहित दिए गए एक से दर्श प्रवचनों का संकलन है। मुक्ति की आकांक्षा।
; ...तुम मुझे जब सुनो तो ऐसे सुनो जैसे कोई किसी गायक को सुनता है। तुम मुझे ऐसे सुनो जैसे कोई किसी कवि को सुनता है। तुम मुझे ऐसे सुनो कि जैसे कोई कभी पक्षियों के गीतों को सुनता है, या पानी की मरमर को सुनता है, या वर्षा में गरजते मेघों को सुनता है। तुम मुझे ऐसे सुनो कि तुम उसमें अपना हिसाब मत रखो। तुम आनंद के लिए सुनो। तुम रस में डूबो। तुम यहां दुकानदार की तरह मत आओ। तुम यहां बैठे-बैठे भीतर गणित मत बिठाओ कि क्या इसमें से चुन लें और क्या करें, क्या न करें। तुम मुझे सिर्फ आनंद-भाव से सुनो।

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Name अष्‍टवक्र महागीता भाग 1 मुक्ति की आकांक्षा
ISBN 818419000X
Pages 318
Language Hindi
Author Osho
Format Hard Bound
DPB code DB 01431
Ashtavakra Mahageeta Bhag 1 Mukti Ki Aakanksha
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